Gazal ग़ज़ल (غزل )

Wednesday, September 7 2016

ग़ज़ल (غزل )

ग़ज़ल (غزل ) उधर दामन बचाया था इधर पल्लू समेटा था मगर जो आग लगनी थी वो लग कर ही रही आख़िर उधर उसको छुपाया था इधर ख़ुद को मिटाया था मगर जो बात होनी थी वो होकर ही रही आख़िर उजाले ख़ूब रोशन थे मुनव्वर चाँद भी उतना स्याह रातों को आना था वो आकर ही रहीं आख़िर संभाला लाख था ख़ुद को क़दम रखे संभल कर थे मगर जो चोट  […]

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